गज़ल - मुहब्बत का आँगन
कश्ती अरमानों की खुद मैंने ही डुबोई थी ।
उसके नज़रों के समन्दर में ऐसी खोई थी ।।
नहाई तरबतर मैं फिर ग़मों की बारिश में ।
के उसके कान्धे पे सर रख के खूब रोई थी ।।
कदम-कदम पे ये खूनी निशान कैसे हैं ।
ये सरज़मीं तो मेरे आँसुओं ने धोई थी ।।
मकां के साथ वो आँगन भी जल गया जिसमें ।
महकते फूल से तितली लिपट के सोई थी ।।
उसी कबीले की बस गुमशुदा चराग़ हूँ मैं ।
के जिसके दिल में मुहब्बत खुदा ने बोई थी ।।
@सरोज गुप्ता
🙏🙏
ReplyDelete🙏🙏
Deleteवाह, बहुत उम्दा🙏
ReplyDeleteबेहद शुक्रिया आपका 🙏🙏
DeleteLajawaab... 🌺🌺🌺🌺
ReplyDeleteबेहद शुक्रिया आपका 🙏🙏
Deleteबेहद खूबसूरत। 🌸
ReplyDeleteबहुत बहुत शुक्रिया आपका 🙏🙏
Deleteबेहद खूबसूरत बेहद रूमानी गज़ल 💐💐🙏🏼
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आपका डियर 🙏🙏
DeleteBahut khub... Aadarniyaa...☺🙏💐
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आपका डियर 🙏🙏
DeleteMeri anti ji 🙏🙏🙏🙏🥰
ReplyDelete🥰🥰🥰🙏🙏
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