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कविता - पुत्र

पुत्र के भी वेदना को जानिए, कष्ट होता है उसे भी मानिए । मन में चिंतन भाव लेकर वो रहे घावों को उसके भी तो पहचानिए ।। यदि इन्हें हम इक उचित आकार दें, प्रेम औ ....कर्त्तव्य के संस्कार दें । राष्ट्र के आदर्श नायक ये बनेंगे यदि उचित मूल्यों भरा परिवार दें ।। उत्तराधिकारी यदी वो पितृ का, साथ में बोझा लिये दायित्व का । निर्वहन करने की खातिर वो चला छोड़ कर सुख गेह औ अपनत्व का ।। ग्रीष्म, वर्षा, शीत सह हर वेष में प्रेषित न कर वो दुख किसी संदेश में । बस दिखाता है खुशी हर रोज अपनी चाहें दुख लाखों सहे परदेश में ।। भाई है वो बहना का पहरेदार बनकर, बेटा है वो माॅं बाप का पतवार बनकर । जब देश के हित में चला लड़ने लड़ाई माॅं भारती का इक सिपहसालार बनकर ।। होते नहीं हैं पुत्र सारे व्याभिचारी, ये भी होते हैं ..बड़े ही संस्कारी । क्यूॅं भला थोपें सदा हम दोष इन पर इनको गढ़ना है हमारी जिम्मेदारी ।। @सरोज गुप्ता