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Showing posts from January, 2022

गज़ल - नहीं करते

 गज़ल - तन्हाई बहर - 1222  1222  1222  1222 कभी तन्हाइयों में इस  कदर आया नहीं करते ।  अगर आ ही गये हो तो पलट जाया नहीं करते ।।  ये उठती सी निगाहों को सनम दीदार हो जाये ।  किसी चिलमन के कोने से कभी साया नहीं करते ।।  फ़लक तक फैले चाहत की समन्दर सी ये गहराई ।  किसी दीवाने अपने ही को अज़माया नहीं करते ।।  जो लम्हें चंद हैं अपने तो आओ ग़ुफ्तग़ू कर लें । उमर को ऐसे शरमा कर के यूँ ज़ाया नहीं करते ।।  मुकम्मल ज़िन्दगी कर लें बिता के तेरे बाँहों में ।  अज़ी मसरूफ़ियत के मर्सिये गाया नहीं करते ।।  @सरोज गुप्ता

कविता - तुम्हारा नाम

चढ़ रहे हैं दिन ढल रही है शाम,  लो फिर याद आया प्रिये ! तुम्हारा नाम ।।  हवाओं में महक घुली साँसों की सुगंधों से,  छुअन की अनुभूति मिली देह के अनुबंधों से, यादों के बादल छाये खो गई तपन की घाम, सतरंगी से इंद्रधनुष में छवि तेरे अभिराम ।  लो फिर याद आया प्रिये ! तुम्हारा नाम ।।  मुझको चिढ़ाती रहीं नीम पर बैठी यादें,  चंचली मुस्कान लिए सावन फ़ागुन झाँकें,  हिय ये पूछे मुझसे अब क्या यादों का काम ? बीते से एहसासों पर क्या कर दूँ पूर्ण विराम ? लो फिर याद आया प्रिये ! तुम्हारा नाम ।।  @सरोज गुप्ता स्वरचित, मौलिक

दोहावली - जाड़ा

 शीत लहर ये कर रही, जीना अब दुश्वार ।  जीव जंतु इंसान पर, घातक किये प्रहार ।।  दुबके दुबके हैं नगर, सिकुड़े सिकुड़े गाँव ।  मिलती राहत धूप में, चुभती है अब छाॅंव ।।  पौधे भी अकड़े पड़े, मचा हुआ कोहराम । चंदा तारों के सहित, रवि को हुआ जुकाम ।।  ओढ़े कंबल धुंध की, प्रकृति खड़ी चुपचाप ।  माफ करो हे शीत जी, अब जाओ घर आप ।।  दिन बीते ये फुर्र से, खिंचती जाती रात ।  गिरती आँगन ओस यूँ, जैसे हो बरसात ।।  ठहरो थोड़ा धूप जी, जाड़ा जाये भाग ।  धरा गगन के बीच में, छिड़े बसंती राग ।।  @सरोज गुप्ता