गज़ल - मुहब्बत का आँगन
कश्ती अरमानों की खुद मैंने ही डुबोई थी । उसके नज़रों के समन्दर में ऐसी खोई थी ।। नहाई तरबतर मैं फिर ग़मों की बारिश में । के उसके कान्धे पे सर रख के खूब रोई थी ।। कदम-कदम पे ये खूनी निशान कैसे हैं । ये सरज़मीं तो मेरे आँसुओं ने धोई थी ।। मकां के साथ वो आँगन भी जल गया जिसमें । महकते फूल से तितली लिपट के सोई थी ।। उसी कबीले की बस गुमशुदा चराग़ हूँ मैं । के जिसके दिल में मुहब्बत खुदा ने बोई थी ।। @सरोज गुप्ता