Posts

Showing posts from July, 2021

गज़ल - मुहब्बत का आँगन

 कश्ती अरमानों की खुद मैंने ही डुबोई थी । उसके नज़रों के समन्दर में ऐसी खोई थी ।। नहाई तरबतर मैं फिर ग़मों की बारिश में । के उसके कान्धे पे सर रख के खूब रोई थी ।।  कदम-कदम पे ये खूनी निशान कैसे हैं । ये सरज़मीं तो मेरे आँसुओं ने धोई थी ।। मकां के साथ वो आँगन भी जल गया जिसमें । महकते फूल से तितली लिपट के सोई थी ।। उसी कबीले की बस गुमशुदा चराग़ हूँ मैं । के जिसके दिल में मुहब्बत खुदा ने बोई थी ।। @सरोज गुप्ता

गज़ल - शोख़ गज़ल कहते हैं

Image
हमारे इश्क को हम ख्वाबे ..अमल कहते हैं । शोहरतें किस्मतें सब रब का फजल कहते है ।। ये अदायें बखूबी......आफरीन हैं जानम । जमाले हुस्न को हम शोख गजल कहते हैं ।। ये जुल्फ हैं या घनेरी.......घटाएं सावन की । आंख को मद भरी प्याली या कंवल कहते हैं ।। जुस्तुजू आपका अब....जीने न देगी हमको । हसरते इश्क या नीयत का खलल कहते हैं ।। ख्वाबों के गुलसितां में जिन्दगी रोशन कर लूँ । न बसे खंडहर बसने पे......महल कहते हैं ।। @सरोज गुप्ता