गज़ल - मुहब्बत का आँगन

 कश्ती अरमानों की खुद मैंने ही डुबोई थी ।

उसके नज़रों के समन्दर में ऐसी खोई थी ।।


नहाई तरबतर मैं फिर ग़मों की बारिश में ।

के उसके कान्धे पे सर रख के खूब रोई थी ।। 


कदम-कदम पे ये खूनी निशान कैसे हैं ।

ये सरज़मीं तो मेरे आँसुओं ने धोई थी ।।


मकां के साथ वो आँगन भी जल गया जिसमें ।

महकते फूल से तितली लिपट के सोई थी ।।


उसी कबीले की बस गुमशुदा चराग़ हूँ मैं ।

के जिसके दिल में मुहब्बत खुदा ने बोई थी ।।


@सरोज गुप्ता

Comments

  1. वाह, बहुत उम्दा🙏

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  2. बेहद खूबसूरत। 🌸

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका 🙏🙏

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  3. बेहद खूबसूरत बेहद रूमानी गज़ल 💐💐🙏🏼

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका डियर 🙏🙏

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  4. Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका डियर 🙏🙏

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  5. Meri anti ji 🙏🙏🙏🙏🥰

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