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गज़ल - याद आता है (2)

मुझे वो खूबसूरत सा, फ़साना याद आता है ।  मिरी ख़ातिर तुम्हारा गुनगुनाना याद आता है ।।  वो मुझसे प्यार का इज़हार, करने के इरादे से ।  मिरे घर का तेरा चक्कर लगाना याद आता है ।।  दिलाई थी कभी चूड़ी जो तुमने लाल रंगों की ।  खुशी से चूड़ियों का, खनखनाना याद आता है ।।  खुले गेसूँ से मेरे खेलना औ उंगलियाँ करना । उन्हीं गेसूँ में तेरा जग भुलाना याद आता है ।।  महकते से ख़तों में इक, खुमारी साथ रहती थी ।  ख़तों को वो क़िताबों में, छुपाना याद आता है ।।  कभी रूठे अगर तुमसे, हमारी दिल्लगी थी वो ।  मनाना वो तेरा, अपना सताना याद आता है ।।  न भूली हूँ न भूलूँगी, वो वादे, वो मुलाकातें ।  मुझे मंज़र जवानी का, सुहाना याद आता है ।। @सरोज गुप्ता

गज़ल - याद आता है (1)

मुझे वो खूबसूरत सा, ज़माना याद आता है ।  सुहाने बचपने का हर, फ़साना याद आता है ।।  वो चढ़ना पीठ पे बाबा के कैसे भूल सकती हूँ ।  समूचे गाँव में मुझको घुमाना याद आता है ।।  पकड़ना तितलियों को, दौड़ना फिर गिर के रो देना ।  दवा ज़ख्मों पे दादी का लगाना याद आता है ।।  किसी दावत से कम ना था,वो माँ के हाथ का खाना ।  उन्हीं के हाथ का खाना ख़जाना याद आता है ।।  पिता का लाड़ जीवन भर , रहेगा साथ में मेरे ।  मिरे सिर पे वो हाथों का फिराना याद आता है ।।  लड़कपन के कई किस्से मेरी यादों में हैं अब भी । शरारत से भरा बचपन, सुहाना याद आता है ।। @सरोज गुप्ता

छंद - घनाक्षरी

 शिव विवाह      घनाक्षरी ********* गले मे भुजंग डाले, मृग छाल तन डाले । दुल्हा बने भोले करे,नंदी की सवारी है ।। भभूति गात साजते,जटा में गंग धारते । मात गौरी को ब्याहने,आए त्रिपुरारी है ।। डमरू,त्रिशूल,हाथ,भूत-प्रेत लिए साथ । वर यात्रा ऐसे देख,भीति सखि सारी है ।। मुख पे मुस्कान सोहे, गौरी माँ का मन मोहे । प्रेम को निभाने आए, प्रेम के पुजारी है ।।  @सरोज गुप्ता

कविता - पुत्र

पुत्र के भी वेदना को जानिए, कष्ट होता है उसे भी मानिए । मन में चिंतन भाव लेकर वो रहे घावों को उसके भी तो पहचानिए ।। यदि इन्हें हम इक उचित आकार दें, प्रेम औ ....कर्त्तव्य के संस्कार दें । राष्ट्र के आदर्श नायक ये बनेंगे यदि उचित मूल्यों भरा परिवार दें ।। उत्तराधिकारी यदी वो पितृ का, साथ में बोझा लिये दायित्व का । निर्वहन करने की खातिर वो चला छोड़ कर सुख गेह औ अपनत्व का ।। ग्रीष्म, वर्षा, शीत सह हर वेष में प्रेषित न कर वो दुख किसी संदेश में । बस दिखाता है खुशी हर रोज अपनी चाहें दुख लाखों सहे परदेश में ।। भाई है वो बहना का पहरेदार बनकर, बेटा है वो माॅं बाप का पतवार बनकर । जब देश के हित में चला लड़ने लड़ाई माॅं भारती का इक सिपहसालार बनकर ।। होते नहीं हैं पुत्र सारे व्याभिचारी, ये भी होते हैं ..बड़े ही संस्कारी । क्यूॅं भला थोपें सदा हम दोष इन पर इनको गढ़ना है हमारी जिम्मेदारी ।। @सरोज गुप्ता

गज़ल - नहीं करते

 गज़ल - तन्हाई बहर - 1222  1222  1222  1222 कभी तन्हाइयों में इस  कदर आया नहीं करते ।  अगर आ ही गये हो तो पलट जाया नहीं करते ।।  ये उठती सी निगाहों को सनम दीदार हो जाये ।  किसी चिलमन के कोने से कभी साया नहीं करते ।।  फ़लक तक फैले चाहत की समन्दर सी ये गहराई ।  किसी दीवाने अपने ही को अज़माया नहीं करते ।।  जो लम्हें चंद हैं अपने तो आओ ग़ुफ्तग़ू कर लें । उमर को ऐसे शरमा कर के यूँ ज़ाया नहीं करते ।।  मुकम्मल ज़िन्दगी कर लें बिता के तेरे बाँहों में ।  अज़ी मसरूफ़ियत के मर्सिये गाया नहीं करते ।।  @सरोज गुप्ता

कविता - तुम्हारा नाम

चढ़ रहे हैं दिन ढल रही है शाम,  लो फिर याद आया प्रिये ! तुम्हारा नाम ।।  हवाओं में महक घुली साँसों की सुगंधों से,  छुअन की अनुभूति मिली देह के अनुबंधों से, यादों के बादल छाये खो गई तपन की घाम, सतरंगी से इंद्रधनुष में छवि तेरे अभिराम ।  लो फिर याद आया प्रिये ! तुम्हारा नाम ।।  मुझको चिढ़ाती रहीं नीम पर बैठी यादें,  चंचली मुस्कान लिए सावन फ़ागुन झाँकें,  हिय ये पूछे मुझसे अब क्या यादों का काम ? बीते से एहसासों पर क्या कर दूँ पूर्ण विराम ? लो फिर याद आया प्रिये ! तुम्हारा नाम ।।  @सरोज गुप्ता स्वरचित, मौलिक

दोहावली - जाड़ा

 शीत लहर ये कर रही, जीना अब दुश्वार ।  जीव जंतु इंसान पर, घातक किये प्रहार ।।  दुबके दुबके हैं नगर, सिकुड़े सिकुड़े गाँव ।  मिलती राहत धूप में, चुभती है अब छाॅंव ।।  पौधे भी अकड़े पड़े, मचा हुआ कोहराम । चंदा तारों के सहित, रवि को हुआ जुकाम ।।  ओढ़े कंबल धुंध की, प्रकृति खड़ी चुपचाप ।  माफ करो हे शीत जी, अब जाओ घर आप ।।  दिन बीते ये फुर्र से, खिंचती जाती रात ।  गिरती आँगन ओस यूँ, जैसे हो बरसात ।।  ठहरो थोड़ा धूप जी, जाड़ा जाये भाग ।  धरा गगन के बीच में, छिड़े बसंती राग ।।  @सरोज गुप्ता