कविता - तुम्हारा नाम

चढ़ रहे हैं दिन

ढल रही है शाम, 

लो फिर याद आया

प्रिये ! तुम्हारा नाम ।। 


हवाओं में महक घुली

साँसों की सुगंधों से, 

छुअन की अनुभूति मिली

देह के अनुबंधों से,

यादों के बादल छाये

खो गई तपन की घाम,

सतरंगी से इंद्रधनुष में

छवि तेरे अभिराम । 

लो फिर याद आया

प्रिये ! तुम्हारा नाम ।। 


मुझको चिढ़ाती रहीं

नीम पर बैठी यादें, 

चंचली मुस्कान लिए

सावन फ़ागुन झाँकें, 

हिय ये पूछे मुझसे

अब क्या यादों का काम ?

बीते से एहसासों पर

क्या कर दूँ पूर्ण विराम ?

लो फिर याद आया

प्रिये ! तुम्हारा नाम ।। 


@सरोज गुप्ता

स्वरचित, मौलिक

Comments

  1. बहुत सुंदर🙏🙏

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    1. स्नेहिल आभार आपका गुंजित 💐💐💐

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  2. अति सुंदर एवं मनमोहक सृजन 💐💐💐🙏🏼

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    1. सादर धन्यवाद आपका डियर 🙏🙏💐💐

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  3. बहुत ही ख़ूबसूरत रचना 💕💕

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका डियर 🙏🙏💐💐

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